एकला चलो की मायावती की नीति, कैसे खत्म हो राजनैतिक वनवास

दलितों के मामले में मायावती एकाधिकारवादी रवैये से ऊपर नही उठ पा रही हैं जबकि वे इतनी वरिष्ठ हो चुकी है कि उनके सोच में परिपक्वता और व्याप्कता झलकनी चाहिए। उन तक सीमित रहकर दलित मूवमेंट क्या अपने तार्किक अंजाम तक पहुंच सकता है यह एक सवाल है। सही बात तो यह है कि मायावती और दलित मूवमेंट दोनो अलहदा-अलहदा चीजें बन चुकी हैं। मायावती का कौम के उत्थान से कोई लेना-देना नही है। उनके सरोकार सत्ता को अपनी मुटठी में करने तक सीमित हैं। इसमें उन्हें कोई नया दलित चेहरा उभरने देना गंवारा नही है क्योंकि ऐसा होना उनको अपना प्रतिद्वंदी तैयार हो जाना लगता है। गुजरात के राजनीतिक संघर्ष से निकलकर राष्ट्रीय क्षितिज पर धूमकेतु की तरह उभर रहे जिग्नेश मेवाड़ी को प्रमोट करने की वजह से वे कांग्रेस से भड़क गईं हैं। अपने जन्म दिन पर उन्होंने कांग्रेस और भाजपा को एक ही तराजू में तौलते हुए जो भड़ास निकाली उससे इसका इजहार हो गया।
अपने गृह प्रदेश में जहां लोकसभा चुनाव में मायावती को एक सीट नही मिली वहीं विधान सभा चुनाव में भी उनकी स्थिति शर्मनाक रही। इन चुनाव परिणामों के सदमे की वजह से डिप्रेशन की शिकार हो गई थीं। इसलिए लंबे समय तक उनकी बोलती बंद रही। उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया तांकि अपना दामन संघर्ष की राजनीति में न उलझाना पड़े। इस दौरान वे कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों के साथ भाजपा के विरोध में एक मोर्चा बनाने के बारे में सकारात्मक संकेत देती रहीं। लेकिन प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनावों ने उनका गुरूर वापस लौटा दिया है। जिससे फिर उनका दहाड़ना शुरू हो गया है। अपने जन्म दिन पर जब वे दहाड़ी तो भाजपा के साथ कांग्रेस पर भी उन्होंने अपना गुस्सा उतारा और कहा कि दोनों पार्टियां उनको खत्म करना चाहती हैं। कांग्रेस पर गुस्से की वजह साफ करने में भी उन्होंने संकोच नही दिखाया। उन्होंने खुलकर जिग्नेश मेवाड़ी का नाम भी इस संदर्भ में दे दिया।
अकेले जिग्नेश मेवाड़ी की बात नही है, वे जातीय दंगे के समय सहारनपुर गई जरूर थीं लेकिन उन्होंने यह भी जाहिर किया था कि उन्हें चंद्रशेखर रावण बिल्कुल नही सुहा रहे। मायावती बुजुर्ग हो चुकी हैं इस बीच नौजवानों के इस देश में राजनीति में नई पीढ़ी उभर रही है। दलित राजनीति भी इसका अपवाद नही हो सकती। युवा दलित राजनीति के प्रतीक मायावती के भाई और भतीजे नही हो सकते। भले ही वे उनके लिए कितनी भी कोशिश कर लें। दरअसल मायावती के भाई और भतीजे का माइंड सैट राजनीतिक नही है। वे स्वभाव से कारोबारी हैं इसलिए मायावती के द्वारा प्रोजेक्ट किये जाने के बावजूद उन्होंने अभी तक कही कोई ऐसे तेवर नही दिखाये जिससे लगे कि कौम के आगे रहनुमा के रूप में अपने को तराशने के लिए संघर्ष करने में उन्हें कोई दिलचस्पी है। दूसरी ओर चाहे जिग्नेश मेवाड़ी हों चंद्रशेखर रावण ऐसा भी नही है कि दलित राजनीति के युवा आगाज समझे जा रहे इन लोगों ने मायावती को निशाने पर रखने का कोई प्रयास किया हो। जाहिर है कि इसके बावजूद मायावती का इन नौजवानों से चिढ़ना बेतुका है।
मायावती को यह समझना चाहिए कि मुस्लिम तुष्टीकरण का हौवा खड़ा करके भाजपा हिंदुओं के ध्रुवीकरण से सत्ता की दौड़ में अपनी बढ़त का जो कमाल दिखा रही है उसके ज्वार में दलित भी आप्लावित हुए बिना नही रहे। जबकि दलित चिंतक हमेशा से यह समझा रहे हैं कि हिंदुत्व के दायरे में दलितों को गरिमापूर्ण ढंग से जीवन यापन का अधिकारी मिलना संभव नही है। बाबा साहब अंबेडकर इसलिए जब निर्णायक हो गये तो उन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली थी। स्वयं कांशीराम ने भी इसी कारण उनका अनुसरण किया था। जो लोग अंबेडकर की विरासत की दावेदारी करना चाहते हैं उनके लिए बौद्ध धर्म अपनाना एक अनिवार्य शर्त की तरह हो गया। इसलिए मायावती ने भी अतीत में हमेशा यह जाहिर किया कि जैसे वे काफी पहले बौद्ध दीक्षा ले चुकी हों लेकिन हाल ही में अचानक उन्होंने यह जाहिर करने की जरूरत महसूस की कि वे अभी हिंदू समाज का ही एक अंग हैं। उन्होंने कुछ ही दिन पहले कहा था कि अगर भाजपा ने दलितों का उत्पीड़न करने वाली कारिस्तानिया नही रोकी तो वे धर्म बदलकर बौद्ध हो जायेगीं। अभी तक वे बौद्ध नही हुई हैं यह सूचना उन पर आस्था रखने वालों तक के लिए किसी झटके से कम नही थी।
सिद्धांतहीनता और अवसरवादिता जिसे कोई धर्म न होना कहते हैं। सच्चाई यह है कि मायावती में यही चीज है उनका कोई धर्म नही है। इसलिए दलित मूवमेंट की सारी मूलभूत बातों से उनका कार्यव्यवहार परे रहा है। बाबा साहब ने शोषित समाज से अपनी-अपनी जातिगत पहचान का मोह छोड़कर एक बौद्ध संज्ञा में बंध जाने की वकालत की थी। जबकि मायावती ने जातिगत भाईचारा समितियां बनाकर यह मंत्र दिया कि जातिगत पहचान की मजबूती से ही वंचित कुछ हासिल कर पायेगें। उन्होंने जताया कि भले ही बाबा साहब चाहते रहे हों लेकिन जहां तक उनका सवाल है उन्हें वर्ण व्यवस्था मिटाने में कोई दिलचस्पी नही है। क्योंकि यह व्यवस्था जितनी फलेगी-फूलेगी उनको उतना ही राजनैतिक लाभ होगा। यहां तक कि सवर्णों में जातिगत कटटर लोगों को ही उन्होंने वरीयता दी जो सांसद, विधायक और मंत्री बनकर स्थापित हो गये और बाद में जिन्होने मौका मिलने पर पार्टी छोड़ी तो दलितों से नफरत की अपनी फितरत के अनुरूप काम किया। जो  दलितों के दमन का नया अध्याय लिख गया। उनकी रहनुमाई के चलते धर्म के आधार पर अत्याचार के खिलाफ दलितों में जो जज्बा था उसकी आग बुझ गई और बसपा सरकार में फायदा उठाकर माल कमाने वाले दलित ढुलमुल विचारधारा के कारण बुरी तरह पूजापाठी हो गये। यहां तक कि बसपा के पदाधिकारियों तक को अंधविश्वास और कर्मकांड के मामले में सवर्णों के कान काटते देखा जाने लगा। दिशाहीनता का ही नतीजा था कि मायावती ने अपनी सरकार के समय पिछड़ों से भेदभाव करके बहुजन का आधार खोखला कर डाला। उत्तर प्रदेश में जब वे भाजपा के सहयोग से सरकार चला रहीं थीं तब समझौते में कोई ऐसी बात नही थी जिससे दूसरे राज्यों में उन्हें भाजपा की मदद करनी पड़ती। लेकिन वे गुजरात में नरेंद्र मोदी के लिए प्रचार करने चली गई बिना इसकी परवाह किये कि इससे उनके मुस्लिम समर्थक कितने आहत होगें। उत्तर प्रदेश में सही तरीके से भूमि सुधार न होने से दलितों को खेती में हिस्सेदारी नही मिल पाई थी। बसपा के संकल्प में शामिल था कि जब भी उसे सत्ता में आने का अवसर मिलेगा वह इस मामले में दलितों के साथ न्याय करेगीं। लेकिन अपनी पूर्ण बहुमत की सरकार के समय सीलिंग को नये रूप में लागू करने के अपने इरादे से मुकरकर उन्होंने दलितों को ठगा रह जाने के लिए मजबूर कर दिया। आज जब मुसलमानों के साथ गाय के मुददे पर दलित भी उत्पीड़ित किये जा रहे हैं, आरक्षण के बहाने उन्हें नीचा दिखाने के लिए गालियां तक देने से परहेज नही किया जा रहा, राजनैतिक नियुक्तियों में उनके प्रतिनिधित्व और प्रोत्साहन की परवाह नही की जा रही। दलित समाज के अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों से दूर रखा जा रहा है तो जागरूक दलितों को एहसास हो रहा है कि हिंदुत्व के लिए राजनीति में अपना दबादबा बलि चढ़ा देना उन्हें कितना भारी पड़ रहा है। इसके बावजूद मायावती तो उनके लिए लड़ने नही आ रहीं। दलित समाज स्वाभिमान की जिंदगी का स्वाद ले चुका है। इसलिए दोयम श्रेणी के नागरिक के रूप में धकेलने के रवैये के खिलाफ तेवर दिखाने वाले नौजवान उसके बीच से बाहर निकलकर आयेगें। मायावती से फिलहाल इनकी कोई प्रतिस्पर्धा नही है। इसलिए होना तो यह चाहिए कि मायावती उनकी पीठ थपथपायें पर मायावती तो उनसे जली भुजी जा रही हैं। उनका रवैया तो भाग्यवादी जैसा है कि जो कुछ करना नही चाहते सोचते हैं आम के पेड़ के नीचे लेट जाओ भाग्य होगा तो हवा चलेगी और फल उनके मुंह में आ जायेगा।
स्थानीय निकाय चुनाव में दलित-मुस्लिम गठजोड़ के मजबूत होने से लोक सभा और विधान सभा चुनाव के लिए उन्होंने अगर कोई उम्मीदें संजोई हैं तो वे शेखचिल्ली का सपना ही साबित होगीं। शहरों का समीकरण ऐसा है इसलिए निकाय चुनाव में यह गठजोड़ बाड़ के समय सांप और आदमी का एक मचान पर आ जाने जैसा है। 1988 में चैदह साल बाद जब नारायण दत्त तिवारी सरकार ने उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकाय के चुनाव कराये थे उस समय इसी समीकरण की वजह से पहली बार बसपा का डंका गूंजा था। लेकिन एक साल बाद जब विधानसभा के चुनाव हुए तब बसपा को केवल 13 सीटों पर संतोष करना पड़ा। बाद के चुनावों में भी मुस्लिमों का अपेक्षित समर्थन न मिलने की वजह से बसपा 2007 के पहले तक अपनी दम पर बहुमत के नजदीक तक नही पहुंच पाई थी। इस बीच उसने अच्छे खासे सवर्ण वोट जुटाने की भी रणनीति बना ली तब कहीं जाकर पहली बार उसकी पूर्ण बहुमत से सरकार बनी। वह भी एक कार्यकाल के बाद ध्वस्त हो गई। इसलिए निकाय चुनाव के समीकरण लोकसभा चुनाव में भी बसपा दोहरा सकेगी इसका मुगालता उन्हें नही पालना चाहिए। जमीनी हकीकत यह है कि लोक सभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में मुसलमान वोटों की पहली पसंद सपा और कांग्रेस होगी। उप चुनावों से दूर रहने की नीति को बरकरार रख बसपा खुद ही इसमें मदद कर रही है।
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कन्हरी में डीएम-एसपी ने मिसमार कराये अतिक्रमण

कोंच-उरई । शासन के निर्देश पर एंटी भूमाफिया अभियान के तहत गुरुवार को प्रशासन ने विकास खंड नदीगांव के ग्राम कन्हरी में डीएम डॉ. मन्नान अख्तर तथा एसपी एपी सिंह ने पहुंच कर अपने सामने कमोवेश चार जगहों के अतिक्रमण मिसमार कराये। अधिकारिया ने लोगों को कड़ी हिदायत दी कि सरकारी भूमि, तालाब आदि पर कतई कब्जा न करें, ऐसा करने की स्थिति में संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी जायेगी।

श्रावस्ती मॉडल की तर्ज पर प्रशासन गांवों में जाकर सरकारी जमीनों से अबैध कब्जे हटवाने के लिये वाकायदा अभियान चला रहा है जिसमें रोज ही दो चार गांवों का भ्रमण कर अधिकारी अपने सामने ही कब्जे हटवाने का काम कर रहे हैं। गुरुवार को विकास खंड नदीगांव के ग्राम कन्हरी में खुद डीएम डॉ. मन्नान अख्तर तथा एसपी अमरेन्द्रप्रसाद सिंह ने पहुंच कर चार जगहों के अतिक्रमण हटवाये। राजेश बरार का चबूतरा काटा गया, चकरोड पर रघुराजसिंह, बाबूसिंह व कौशलकिशोर कब्जा किये थे, अधिकारियों ने अपने सामने ही चकरोड खाली करवाया।। इस दौरान एसडीएम सुरेश सोनी, तहसीलदार भूपाल सिंह, एसओ नदीगांव रवीन्द्रकुमार त्रिपाठी, एसआई घनश्याम सिंह के अलावा राजस्व निरीक्षक व लेखपाल आदि मौजूद रहे।

कन्हैयालाल विद्या मंदिर में खेल कूद प्रतियोगिताएं

 

जालौन-उरई । कन्हैयालाल अग्रवाल मैमोरियल बाल विद्या मन्दिर औरइया मार्ग प्रतापपुरा में आज तीन दिवसीय खेलकूंद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें पहले दिन पहले दिन 26 प्रतियोगितायें आयोजित की गई तथा प्रथम द्वित्तीय तथा तृतीय विजेताओं को चुना गया।

विद्यालय में प्रधानाचार्य नंद कुमार राठौर ने तीन द्विवसीय प्रतियोगिता का उद्धाटन करते हुए कहा कि इस प्रतियोगिता के आयोजन का मकसद बच्चों को शिक्षा के साथ खेलकूद की प्रतिभा निखारने का मौका मिल सके। खेल से जहां शारीरिक विकास होता है वहीं मानसिक थकान दूर होती है। आज प्रतियोगिता के प्रथम दिन 100 मीटर 400 मीटर की बालक बालिका तथा जूनियर व सीनियर ऊंची कूद लम्बी कूंद भाला फैक खो खो समेत 26 प्रतियोगितायें आयोजित की गयी जिसमें बालक बालिकाओं ने भाग लिया। प्रतियोगिता के रेफरी राजेश चन्द्र चन्देल तथा पारस मिश्रा ऋग्वेद गुवरेले ने प्रतियोगिता के प्रथम द्वित्तीय तथा तृतीय प्रतिभागियों को चुना गया जिन्हें प्रतियोगिता के अंतिम दिन पुरूस्कार दिया जाएगा। इस मौके पर सभासद खुशबू अग्रवाल अंकित दुवे महेंद्र कपूर आशीष चतुर्वेदी हेमन्त  लक्ष्मी गुप्ता सीता आदि उपस्थित थे।

खाद्य वस्तुओं के सैम्पुल भरे, दुकानदारों में हड़कंप

 

 

कालपी(उरई )। अखाद्य की मिलावट करना अब मिलावटखोर कारोबारियों को भारी पड़ने लगा है। राजकीय प्रयोगशाला में खाद्य सामग्रियों के नमूने के परीक्षण फेल होने पर विभाग ने सख्ती से लिया है और कालपी के ग्यारह व्यापारियों के ऊपर खाद्य सुरक्षा अनिनियम की धाराओं के तहत अभियोग दर्ज करा दिया है। तहसील कालपी के खाद्य सुरक्षा अधिकारी राहुल शर्मा ने बतलाया कि आरोपियों में रामप्रकाश साहू सरसई, कल्लू दाल मिल इटौरा की अरहर की दाल, सुरेश प्रजापति जोल्हूपुर के दूध समेत 11 दुकानदारों के भरे गए खाद्य वस्तुओं के सैम्पुलों को समय-समय पर राजकीय प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए भेजा गया था। सैम्पुल फेल होने पर दोषियों के खिलाफ न्यायालय अपर जिला मजिस्टेªट उरई के समक्ष अभियोग दर्ज करा दिए गए है।

पुलिस से मिलकर हो रहा था अवैध खनन प्रधान ने लगाई आपत्ति

कदौरा(उरई )। कदौरा क्षेत्र के ग्राम बबीना में निर्माण के लिए ठेकेदारांे ने माफियाओं की भूमिका अदा करते हुए प्रशाशन की बगैर अनुमति से किसान के खेत से रातांेरात मिट्टी खनन सैकड़ों ट्रैक्टर ट्राली से करवाया गया। वही ग्रामीणों द्वारा आपत्ति लगाकर पुलिस कप्तान को सूचना दी तो मौके पर पहुंची थाना पुलिस द्वारा चार ट्रैक्टर ट्राली व् तीन चालकों को हिरासत में ले लिया और अलसुबह उन्हें बाइज्जत ले देकर बरी कर दिया वही। मिट्टी भरे ट्रैक्टरों पर पुलिस के अलावा खनिज अधिकारी द्वारा जांच कर कार्यवाही की गयी।

ज्ञातव्य हो कि क्षेत्र के ग्राम बबीना हांसा में सड़क निर्माण कार्य हो रहा है जो कि बेहद घटिया किस्म का है उसमे न ही पानी और न ही कोई मानक है जिसकी ग्रामीण आपत्ति भी लगा चुके है। लिहाजा जल्द से जल्द कार्य पूरा करने को लेकर उरई निवासी ठेकेदारो द्वारा बीती रात सड़क पर मिट्टी की आवश्यता होने पर थाना पुलिस व् मौके पर डायल 100-1586 को ले देकर खनन शुरू करवा दिया। देर रात अलीपुर मौजे में एक किसान के खेत से जेसीबी से मिट्टी खुदवाकर बबीना में सड़क किनारे आधा सैकड़ा ट्रैक्टरों से डलवाई गयी। उक्त खनन पर आपत्ति जताते हुए ग्राम प्रधान गौरव उपाध्याय द्वारा कप्तान को सूचना कर कार्यवाही की मांग की गयी। जिससे मौके पर पहुंची थाना पुलिस दरोगा जीतेन्द्र द्वारा मिट्टी भरे व् खाली चार ट्रैक्टर ट्राली व तीन चालकांे को हिरासत में लेकर थाने लाया गया। वही अलसुबह सूचना पर पहुंचे खनिज अधिकारी राजेश सिंह द्वारा उक्त खनन की जांच पड़ताल कर कार्यवाही की गयी। वही पुलिस द्वारा उक्त चालकों को ले देकर छोड़ दिया गया।

रेडक्रास सोसायटी के शिविर में लोगों ने कराया स्वास्थ्य परीक्षण

उरई । स्वास्थ शिविरो के माध्यम से दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों के नागिरको का स्वास्थ सेवाये प्रदान कराने का रैडक्रास सोसाइटी जनपद जालौन का यह एक सराहनीय कदम है।

उक्त बात जिलाधिकारी डा. मन्नान अख्तर ने कोंच तहसील के विकास खण्ड नदीगांव के जिला परिषद इण्टर कालैज में आयोजित भारतीय रेडक्रास स्वास्थ शिविर एवं लोक कल्याण मेला एवं जनस्वास्थ शिविर में वहां उपस्थित अपार जनसमूह को सम्बोधित करते हुए कही। उन्होने कहा कि दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रो में ऐसे स्वास्थ शिविरो के माध्यम से एक स्थान पर विभिन्न बीमारियों का इलाज सम्भव हो जाता है इसके साथ ही नागरिको को अपने क्षेत्र मे ही अपनी बीमारी की जांच करा कर दवा मिल जाती है। रेडक्रास सोसाइटी के इस कदम का स्वागत है और आसा है कि ऐसे स्वास्थ शिविरो का आयोजन अति पिछडेे़ क्षेत्रो मे किया जाये। जिससे आम नागरिको के स्वास्थ परिक्षण होता रहे। जिलाधिकारी द्वारा एलोपैथिक, होम्योपैथिक, आयुर्वेदिक द्वारा लगाये गये विभिन्न काउण्टरो का अवलोकन किया तथा लोक कल्याण समिति द्वारा गरीबों को 50 कम्बल का वितरण किया गया। कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए सीएचसी में महिला चिकित्सक की तैनाती तथा स्कूलो की स्थिति को सुधारने की मांग उठाई। कार्यक्रम को माननीय विधायक मूलचन्द्र निरंजन, जिला पंचायत अध्यक्ष प्रतिनिधि देवेन्द्र निरजंन, रेड़क्रास सोसाइटी कें अवैतनिक सचिव युद्धवीर सिंह कन्थरिया, लक्ष्मण दास वबानी, एवं कार्यक्रम के सयोजक अभिमन्यु सिहं डिम्पल द्वारा सम्बोधित किया गया। इस अवसर पर पुलिस अधीक्षक अमरेन्द्र प्रसाद सिंह, मुख्य चिकित्साधिकारी डा़. अल्पना बरतारिया, जिलाविधालय निरीक्षक भगवत पटेल, जिला वेशिक शिक्षाधिकारी राजेश कुमार शाही, डा. सुग्रीव बाबू, सचिव रेड़क्रास सोसायटी सहित अन्य अधिकारी एवं रेड़क्रास सोसायटी के सदस्य उपस्थित रहे।

नाला सफाई में लापरवाही, सड़क पर ही छोड़ दिया मलवा

 

उरई। वेदिका के पास गुरुवार को नाले की सफाई के दौरान लापरवाही बरती गई। जिससे जनाक्रोश गहरा गया।

शहर में नाला सफाई के नाम पर मजाक हो रहा है। बस स्टैण्ड के नजदीक वेदिका के किनारे नाले की सफाई कर सारा मलवा सड़क पर ही छोड़ दिया गया। जिससे राहगीरों और वाहन चालकों को भारी मुसीबत का सामना करना पड़ा। लोगों में इसे लेकर जबर्दस्त गुस्सा रहा।